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राजव्यवस्था

विरोध का अधिकार: अनुच्छेद 19 और जंतर-मंतर की बहस

दिल्ली हाईकोर्ट के एक जज ने पूछा कि जंतर-मंतर को विरोध-प्रदर्शन की जगह के रूप में बंद क्यों न कर दिया जाए। आकार पटेल का तर्क है कि एक मौलिक अधिकार अब पुलिस की इजाज़त बनकर रह गया है। अनुच्छेद 19 और सुप्रीम कोर्ट इस बारे में क्या कहते हैं।

Jasvin Thinks2026-10-089 मिनट में पढ़ेंअंग्रेज़ी मूल लेख से अनूदित

विरोध का अधिकार: अनुच्छेद 19 और जंतर-मंतर की बहस
Source: Alnitak-Alnilam-Mintaka, via Wikimedia Commons (CC BY-SA 4.0)

7 अगस्त 2026 को दिल्ली हाईकोर्ट के जस्टिस अमित महाजन ने केंद्र से पूछा कि वह जंतर-मंतर को विरोध-प्रदर्शन की जगह के रूप में बंद करने पर विचार क्यों नहीं कर रहा। वे ऑल इंडिया दलित क्रिश्चियन राइट्स प्रोटेक्शन कमेटी की याचिका सुन रहे थे। यह संगठन करीब 75 लोगों के तीन घंटे के प्रदर्शन के लिए 9 जुलाई से दिल्ली पुलिस के जवाब का इंतज़ार कर रहा था। तीन दिन बाद स्तंभकार आकार पटेल ने डेक्कन क्रॉनिकल में लिखा कि यह मामला दिखाता है कि अनुच्छेद 19 के तहत शांति से इकट्ठा होने का अधिकार अब पुलिस की इजाज़त वाली व्यवस्था बन गया है।

क्या भारत में विरोध करना मौलिक अधिकार है?

हां। संविधान का अनुच्छेद 19(1)(b) सभी नागरिकों को शांति से और बिना हथियार इकट्ठा होने का अधिकार देता है, और अनुच्छेद 19(1)(a) बोलने की आज़ादी देता है। सरकार इन पर सिर्फ भारत की संप्रभुता और अखंडता या सार्वजनिक व्यवस्था के आधार पर उचित पाबंदी लगा सकती है। सुप्रीम कोर्ट कह चुका है कि विरोध-प्रदर्शनों को नियमों में बांधा जा सकता है और तय जगहों तक सीमित किया जा सकता है, लेकिन उन पर पूरी तरह रोक नहीं लगाई जा सकती।

पूरे शहर को बेवजह बंधक क्यों बनाया जाए?

जस्टिस अमित महाजन, दिल्ली हाईकोर्ट, 7 अगस्त 2026 की सुनवाई में मौखिक टिप्पणी (LiveLaw के अनुसार)

असल में क्या हुआ?

ऑल इंडिया दलित क्रिश्चियन राइट्स प्रोटेक्शन कमेटी 10 अगस्त 2026 को सुबह 10 से दोपहर 1 बजे तक जंतर-मंतर पर एक जगह बैठकर प्रदर्शन करना चाहती थी। उसकी मांग थी कि दलित ईसाइयों को अनुसूचित जातियों में शामिल किया जाए। वरिष्ठ वकील संजय घोष ने अदालत को बताया कि संगठन ने 9 जुलाई को अर्ज़ी दी थी, लेकिन पुलिस ने न इजाज़त दी, न मना किया। उन्होंने सुप्रीम कोर्ट के शाहीन बाग फैसले का हवाला दिया, जिसमें विरोध के अधिकार को मान्यता दी गई थी।

केंद्र की ओर से अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल चेतन शर्मा ने कहा कि सुप्रीम कोर्ट पहले से इस पर विचार कर रहा है कि जंतर-मंतर विरोध-प्रदर्शन की तय जगह बना रहे या नहीं। उन्होंने भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS) की धारा 163 (पहले CrPC की धारा 144) के तहत लगे निषेधाज्ञा आदेशों और स्वतंत्रता दिवस से पहले की सुरक्षा व्यवस्था का ज़िक्र किया। उन्होंने यह भी कहा कि अधिकारी पक्के तौर पर नहीं कह सकते कि 75 प्रदर्शनकारी कहीं बहुत ज़्यादा न हो जाएं।

जस्टिस महाजन ने कहा कि उनकी निजी राय में विरोध-प्रदर्शन शहर के अंदर नहीं होने चाहिए, क्योंकि इससे आम लोगों को परेशानी होती है, हालांकि आखिरी फैसला सरकार का है। ये मौखिक टिप्पणियां थीं, किसी आदेश का हिस्सा नहीं। अदालत ने केंद्र का यह आश्वासन दर्ज किया कि पुलिस अगले दिन तक अर्ज़ी पर फैसला कर देगी, और मामले के गुण-दोष पर कुछ कहे बिना याचिका निपटा दी।

इसके बाद क्या हुआ, इसकी जानकारी कम है। एक सामुदायिक समाचार साइट के मुताबिक संगठन ने 10 अगस्त 2026 को जंतर-मंतर पर प्रदर्शन किया। हमें पुलिस के फैसले की कोई प्रकाशित कॉपी नहीं मिली, इसलिए यह पता नहीं कि इजाज़त किन शर्तों पर मिली।

अवधारणा: अनुच्छेद 19 क्या गारंटी देता है?

अनुच्छेद 19(1) नागरिकों की छह आज़ादियां गिनाता है। इनमें से दो मिलकर विरोध का अधिकार बनाती हैं: खंड (a) में बोलने और अभिव्यक्ति की आज़ादी, और खंड (b) में शांति से, बिना हथियार इकट्ठा होने का अधिकार। इस अधिकार के साथ दो शर्तें जुड़ी हैं: सभा शांतिपूर्ण होनी चाहिए, और उसमें हथियार नहीं होने चाहिए।

अनुच्छेद 19(3) सरकार को ऐसे कानून बनाने देता है जो इस अधिकार पर उचित पाबंदी लगाएं। इसके सिर्फ दो आधार हैं: भारत की संप्रभुता और अखंडता, और सार्वजनिक व्यवस्था। पाबंदी कानून से लगनी चाहिए, इन्हीं आधारों से जुड़ी होनी चाहिए, और उचित होनी चाहिए। वह उचित है या नहीं, यह अदालतें तय करती हैं।

अनुच्छेद 19 के तहत अधिकार और उसकी सीमाएं

बिंदुसंविधान क्या कहता हैव्यवहार में इसका मतलब
अधिकारअनुच्छेद 19(1)(b): शांति से और बिना हथियार इकट्ठा होनानागरिक सभा, धरना और जुलूस कर सकते हैं
शर्तेंशांतिपूर्ण और बिना हथियारहिंसक या हथियारबंद भीड़ को यह सुरक्षा नहीं मिलती
इजाज़त वाली सीमाएंअनुच्छेद 19(3): भारत की संप्रभुता और अखंडता, सार्वजनिक व्यवस्थाजगह, समय, रास्ते और संख्या पर नियम
कसौटीपाबंदी उचित होनी चाहिएअदालतें पूरी या मनमानी रोक को रद्द कर सकती हैं
किसे मिलता हैसिर्फ नागरिकों कोविदेशी लोग अनुच्छेद 19 का दावा नहीं कर सकते

सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा है?

  1. 1973 हिम्मत लाल के. शाह बनाम पुलिस कमिश्नर, अहमदाबाद: सरकार सड़कों पर सभाओं के नियम बना सकती है, लेकिन किसी अफसर को बिना किसी दिशानिर्देश के इजाज़त ठुकराने की खुली छूट नहीं दी जा सकती।
  2. 2012 रामलीला मैदान घटना मामला: अदालत ने सोती हुई भीड़ पर आधी रात की पुलिस कार्रवाई की आलोचना की और शांति से इकट्ठा होने के अधिकार को दोहराया।
  3. 2018 मज़दूर किसान शक्ति संगठन बनाम भारत संघ: जंतर-मंतर और बोट क्लब पर विरोध-प्रदर्शनों पर पूरी रोक नहीं लगाई जा सकती; पुलिस से इनके नियमित इस्तेमाल के लिए दिशानिर्देश बनाने को कहा गया।
  4. 2020 अमित साहनी बनाम पुलिस कमिश्नर (शाहीन बाग): विरोध के अधिकार को मान्यता दी गई, लेकिन कहा गया कि सार्वजनिक रास्तों पर अनिश्चित समय तक कब्ज़ा नहीं किया जा सकता और प्रदर्शन तय जगहों पर होने चाहिए।
  5. 2026 केंद्र ने दिल्ली हाईकोर्ट को बताया कि सुप्रीम कोर्ट इस पर विचार कर रहा है कि जंतर-मंतर विरोध-प्रदर्शन की तय जगह बना रहे या नहीं।

इन फैसलों को साथ पढ़ें तो एक संतुलन दिखता है। सरकार तय कर सकती है कि प्रदर्शन कहां, कब और कैसे हो। लेकिन वह विरोध की हर सार्थक जगह खत्म नहीं कर सकती, और यह फैसला किसी अफसर की मनमर्ज़ी पर नहीं छोड़ सकती। प्रदर्शनकारियों के अधिकार को बाकी नागरिकों के आने-जाने और शांति से रहने के अधिकार के साथ तौलना होगा।

पटेल का तर्क: अधिकार, जो पुलिस के हाथ में है

एमनेस्टी इंटरनेशनल इंडिया के अध्यक्ष पटेल का कहना है कि संविधान में जो लिखा है और रोज़ जो होता है, उनमें बहुत फर्क आ गया है। विरोध करने के लिए नागरिकों को स्थानीय थाने में अर्ज़ी देनी पड़ती है। पुलिस इजाज़त दे सकती है, मना कर सकती है, या जवाब ही न दे, और इसी वजह से दलित ईसाई संगठन को अदालत जाना पड़ा। उनके शब्दों में: 'असली अधिकार वहीं रखा है।'

वे इसकी तुलना अमेरिका और यूरोप से करते हैं, जहां दफ्तरों और दुकानों के बाहर तख्तियां लेकर खड़े छोटे समूह आम बात हैं। वे लिखते हैं कि भारत में ऐसी भीड़ को या तो हटा दिया जाएगा या इजाज़त ही नहीं मिलेगी। जहां विरोध की इजाज़त है, वहां भी वह तय जगहों तक सीमित है: दिल्ली में जंतर-मंतर, बेंगलुरु में टाउन हॉल और फ्रीडम पार्क, और मुंबई में आज़ाद मैदान। उनका निष्कर्ष है कि भारत ने विरोध को अपराध जैसा बना दिया है और लगाई गई पाबंदियां उचित नहीं हैं।

पटेल यह भी बताते हैं कि सरकारें विरोध से क्यों बचती हैं। उनके मुताबिक, जब भी भारतीय एकजुट हुए, चाहे कृषि कानूनों के खिलाफ, राष्ट्रीय नागरिक रजिस्टर के खिलाफ या पेपर लीक के खिलाफ, सरकार को पीछे हटना पड़ा। वे भारत के नागरिक समाज को बहादुर लेकिन छोटा बताते हैं, और लोगों से शांति से अपने अधिकार वापस लेने की अपील करते हैं।

दूसरा पक्ष: सार्वजनिक व्यवस्था और बाकी नागरिक

पटेल की राय कड़ी है, और दूसरे पक्ष की बात में भी दम है। शाहीन बाग फैसले में सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि सार्वजनिक रास्तों और जगहों पर अनिश्चित समय तक कब्ज़ा नहीं किया जा सकता। जंतर-मंतर के पास रहने वाले लोगों ने पहले शोर और परेशानी की शिकायत की थी, जिससे वह मुकदमा शुरू हुआ जिसका फैसला 2018 में आया। अगस्त की सुनवाई में केंद्र का पक्ष सार्वजनिक व्यवस्था पर टिका था: निषेधाज्ञा आदेश, स्वतंत्रता दिवस की सुरक्षा और भीड़ के आकार को लेकर अनिश्चितता।

इसलिए असहमति इस पर है कि पाबंदी कितनी हो। कम ही लोग कहते हैं कि प्रदर्शनों पर कोई नियम नहीं होना चाहिए, और सुप्रीम कोर्ट पूरी रोक को पहले ही ठुकरा चुका है। असली सवाल छोटे हैं। क्या ऐसी तय जगह, जिसकी इजाज़त मिलना ही मुश्किल हो, असल में जगह है? क्या पुलिस किसी अर्ज़ी पर एक महीने तक चुप रह सकती है? और क्या प्रदर्शन उन लोगों को दिखना चाहिए, जिनसे बात कही जा रही है?

कड़ियां जोड़ें

  1. अनुच्छेद 19(1)(b) नागरिकों को शांति से और बिना हथियार इकट्ठा होने का अधिकार देता है
  2. अनुच्छेद 19(3) सरकार को सार्वजनिक व्यवस्था के लिए उस पर उचित पाबंदी लगाने देता है
  3. पुलिस की इजाज़त और तय जगहें नियमन के मुख्य औज़ार बन जाते हैं
  4. सुप्रीम कोर्ट नियमन की इजाज़त देता है, लेकिन पूरी रोक (2018) और सड़कों पर अनिश्चित कब्ज़े (2020) को ठुकराता है
  5. 2026 में प्रदर्शन की एक अर्ज़ी एक महीने तक बिना जवाब रहती है और हाईकोर्ट पहुंचती है
  6. बहस फिर शुरू: क्या यह अधिकार नियमों में बंधा है, या सिर्फ इजाज़त बनकर रह गया है?

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बहस

नज़रियामुख्य तर्कदिए गए सबूत
अधिकार पहलेजिस अधिकार के लिए पुलिस की इजाज़त चाहिए, वह अधिकार नहीं रहता75 लोगों के प्रदर्शन पर एक महीने तक कोई जवाब नहीं (पटेल)
सार्वजनिक व्यवस्थाप्रदर्शन से सड़कें, आपात सेवाएं या सुरक्षा बाधित नहीं होनी चाहिएनिषेधाज्ञा आदेश और स्वतंत्रता दिवस की व्यवस्था (केंद्र का पक्ष)
अदालत का संतुलननियम बनाएं, रोक नहीं; तय जगहें, अनिश्चित कब्ज़ा नहींमज़दूर किसान शक्ति संगठन (2018); अमित साहनी (2020)
प्रदर्शन शहर से बाहर होंशहर के अंदर प्रदर्शन से आम लोगों को परेशानी होती हैदिल्ली हाईकोर्ट के जज की मौखिक टिप्पणियां, 7 अगस्त 2026
दिखना ज़रूरी हैसत्ता के केंद्र से दूर हुआ प्रदर्शन उन लोगों तक पहुंचता ही नहीं, जिनसे बात कही जा रही हैतय जगहों पर पटेल का तर्क

आगे क्या हो सकता है?

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भारत के लिए यह क्यों अहम है?

क्षेत्रक्यों अहम है
लोकतंत्रविरोध से नागरिक दो चुनावों के बीच भी अपनी बात रख पाते हैं
हाशिए के समूहजिन छोटे समूहों के पास न मीडिया है न पैसा, वे अपनी बात सुनाने के लिए इकट्ठा होने पर निर्भर हैं
जवाबदेहीशांतिपूर्ण आंदोलनों ने सरकारों को कानूनों और फैसलों पर दोबारा सोचने को मजबूर किया है
कानून का राजइजाज़त के साफ नियम पुलिस की मनमानी कम करते हैं
आम लोगों की सुविधानियम बाकी नागरिकों के आने-जाने और सुरक्षा की रक्षा करते हैं

आगे किन बातों पर नज़र रखें?

  • 1. सुप्रीम कोर्ट का फैसला कि जंतर-मंतर विरोध-प्रदर्शन की तय जगह बना रहेगा या नहीं।
  • 2. दिल्ली पुलिस का कोई स्थायी आदेश, जो प्रदर्शन की अर्ज़ियों पर फैसले की समय-सीमा तय करे।
  • 3. BNSS की धारा 163 के तहत पूरे शहर में निषेधाज्ञा कितनी बार लगाई जाती है।
  • 4. क्या दूसरे हाईकोर्ट दिल्ली के जज की टिप्पणियों से सहमत होते हैं या अलग राय रखते हैं।
  • 5. दलित ईसाइयों को अनुसूचित जाति का दर्जा देने का लंबित सवाल, जिस पर यह प्रदर्शन था।

निष्कर्ष

भारत में विरोध का अधिकार एक मौलिक अधिकार है, लेकिन सीमाओं के साथ। सुप्रीम कोर्ट कह चुका है कि इसे नियमों में बांधा जा सकता है और तय जगहों तक सीमित किया जा सकता है, पर खत्म नहीं किया जा सकता। अगस्त 2026 की सुनवाई ने दिखाया कि बहुत कुछ उस पुलिस अफसर पर निर्भर है, जिसके पास अर्ज़ी पहुंचती है। पटेल की चेतावनी यह है कि जो अधिकार सिर्फ इजाज़त से इस्तेमाल हो, वह किसी कानून में बदलाव के बिना ही धीरे-धीरे कमज़ोर पड़ सकता है।

मुख्य शब्दावली

अभ्यास प्रश्न (मुख्य परीक्षा जैसा)

  • प्रश्न. अनुच्छेद 19(1)(b) के तहत शांतिपूर्ण सभा के अधिकार को नियमों में बांधा जा सकता है, लेकिन खत्म नहीं किया जा सकता। तय विरोध स्थलों पर सुप्रीम कोर्ट के फैसलों के संदर्भ में चर्चा कीजिए। (250 शब्द, GS पेपर II)

स्रोत और आगे पढ़ें

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